राष्ट्रभक्ति किसी दल विशेष की बपौति नहीं 

Publish Date : 05 / 01 / 2019


देश में यही माना जाता रहा है कि राष्ट्रभक्ति किसी दल या समूह विशेष की बपौति नहीं है, किन्तु मध्यप्रदेश की कांग्रेस और गुजरात की भाजपा सरकार ने इस वास्तविकता को झुठला दिया है। पिछले सत्तर सालों से कांग्रेस यही कह रही है कि देश को आजादी उसी ने दिलाई, और राष्ट्रपिता ने इसी दृष्टि से आजादी के बाद कांग्रेस दल को विघटित करने की सलाह भी दी थी, किंतु पिछले कुछ दशकों में कांग्रेस ने राष्ट्रभक्ति का उतना परिचय नहीं दिया, जितना भाजपा दम भर रहीं है। उसने हिन्दुत्व को राष्ट्रभक्ति से जोड़कर अपना नया नारा तैयार किया और उसी को हर जगह दुहरा रही है।
पि छले कुछ सालों से हर क्षेत्र में राजनीति ने प्रवेश कर लिया, सिर्फ राष्ट्रभक्ति ही शेष रह गई थी, उसमें भी अब राजनीति अपना दखल दिखाने लगी है, हाल ही में मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार ने जहां तेरह वर्ष से माह के प्रथम दिन सचिवालय के सामने सामुहिक रूप से गाए जाने वाले वन्दे मातरम गान पर प्रतिबंध लगा दिया वहीं गुजरात की भाजपा सरकार ने स्वयं के स्कूलों में छात्रों की हाजरी के समय उपस्थित जी सर या यस सर कह कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने पर प्रतिबंध लगाकर उसकी जगह जय हिन्दी या जय भारत बोलने के निर्देश जारी किये है, अर्थात अब राष्ट्रभक्ति किस लहजे में प्रस्तुत की जाए, इसका निर्देश भी सत्तारूढ़ दल अपनी सरकारों के माध्यम से देगें और उनका आपकों पालन करना ही होगा, वरना......।
यद्यपि अभी तक देश में यही माना जाता रहा है कि राष्ट्रभक्ति किसी दल या समूह विशेष की बपौति नहीं है, किन्तु मध्यप्रदेश की कांग्रेस और गुजरात की भाजपा सरकार ने इस वास्तविकता को झुठला दिया है। पिछले सत्तर सालों से कांग्रेस यही कह रही है कि देश को आजादी उसी ने दिलाई, और राष्ट्रपिता ने इसी दृष्टि से आजादी के बाद कांग्रेस दल को विघटित करने की सलाह भी दी थी, किंतु पिछले कुछ दशकों में कांग्रेस ने राष्ट्रभक्ति का उतना परिचय नहीं दिया, जितना भाजपा दम भर रहीं है। उसने हिन्दुत्व को राष्ट्रभक्ति से जोड़कर अपना नया नारा तैयार किया और उसी को हर जगह दुहरा रही है, यही नहीं इस नारे को साम्प्रदायिकता से जोड़कर अब यहां तक कहा जाने लगा कि ह्यह्यअगर भारत में रहना है तो भारत माता की जय कहना ही होगा।
मूल रूप से आज के राजनीतिक माहौल को देखकर यह कहा जाए कि आज की राजनीति ने राष्ट्रभक्ति का चौला ओढ़कर अपना राजनीतिक मकसद पूरा करने का संकल्प ले लिया है तो कतई गलत नहीं होगा, और आज की तो वास्तविकता भी यही है। अब सत्ता प्राप्ति का मकसद जनसेवा या जन कल्याण खत्म हो गया है, इसकी जगह अब स्वार्थ सिद्धी और अपने राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति और सत्ता में दीर्घजीवी होना हो गया है। उसके ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों की हाल ही में गठित सरकारें है, अब अपनी सरकार बनते ही सत्तारूढ़ दल का पहला काम पूर्व सरकार के फैसलों को बदलना होता है, फिर वे चाहे जन-कल्याण या राष्ट्रभक्ति की दृष्टि से सही हो या गलत? आज की सरकारों को विकास सिर्फ नारे तक सीमित होकर रह गया है, चुनावी वादें या घोषणा-पत्र अब जुमले बन कर रह गए है और आम वोटर की आकांक्षाऐं सिर्फ कल्पना या मुंगेरीलाल के सपने बनकर रह गई है। क्या हमारे उन लाखों स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों या आजादी की बलिवेदी पर शहीद होने वाले वास्तविक राष्ट्रभक्तों ने कभी ऐसी कल्पना की थी कि महज सत्तर सालों में देश की ऐसी कायापलट हो जाएगी? क्या हमारे राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान लिखने वाले राष्ट्रीय कवियों ने यह सोचा था कि उनकी रचनाऐं राजनीति में बंटकर रह जाएगी और उन पर प्रतिबंध लग जाएगा? लेकिन यह सब हमारे सामने है।
अब राजनीति लोकसेवा या जन-कल्याण का माध्यम नहीं रही अब यह सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक और व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धी का माध्यम बन कर रह गई, या फिर पूर्वाग्रह आधारित बदले की राजनीति का सूत्र बन गई? और यही सत्ता प्राप्ति के बाद प्राथामिकता के बिन्दु बन गए है।
अब सवाल यह कि हमारे आधुनिक भाग्यविधाताओं की इस आत्मघाति और विनाशकारी सोच को बदले कौन? इसका जवाब सिर्फ और सिर्फ देश का आम मतदाता है, जिसे समयानुसार जागरूक होकर स्थिति परिस्थिति में बदलाव लाने के ठोस कदम उठाना पड़ेंगे, हमारे संविधान और लोकतंत्र पद्धति के तहत् आम वोटर को सौंपे गए अहम उत्तरदायित्व का निर्वहन सही पद्धति से उसे करना होगा, या यों कहे स्वार्थ सिद्धी में लिप्त हमारे इन आधुनिक भाग्यविधाताओं को माकूल सबक सिखाना होगा। वह भी समय रहते, वर्ना न सिर्फ हमारे देश बल्कि पूरे जनजीवन की व्यवस्थाऐं तहस-नहस हो जाएगी और उसके जिम्मेदार ये राजनीतिक भाग्यविधाता नहीं हमारे देश का आम मतदाता भी होगा। इसलिए राष्ट्रधर्म को राजनीति से बाहर रखना ही होगा।
ओमप्रकाश मेहता

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