कश्मीरियों के दर्द को भी समझने की जरूरत

Publish Date : 22 / 11 / 2018


अक्सर यह कहा जाता है कि घाटी में पत्थर फेंकने वाले और मुठभेड़ में मारे जाने वाले आतंकियों के जनाजे में जो स्थानीय लोग कथिततौर पर शामिल होते हैं वो आतंकियों का साथ देते हैं। इस कारण जम्मू-कश्मीर को आतंकियों से निजाद नहीं मिल पाता है और सुरक्षाबलों के लिए ये सभी हमेशा से सिरदर्द साबित होते रहे हैं। इसके चलते सेना को भी आए दिन घुसपैठिए,आतंकवादियों से दो-चार होना पड़ता है और घर-घर सर्च आॅप्रेशन चलाना पड़ता है सो अलग। वहीं दूसरी तरफ विचार करें तो यह भी याद दिलाने की आवश्यकता हमेशा से महसूस होती रही है कि घाटी में रहने वाले भोले-भाले कश्मीरियों की मानों चक्की के दो पाटों के बीच पिसते रहना ही किस्मत बन गई है। इसकी पुष्टि करने के लिए महज इन घटनाओं का जिक्र करना काफी होगा कि पिछले दिनों आतंकवादियों ने शोपियां जिले के सदपोरा इलाके से एक नागरिक का अपहरण किया और फिर उसकी हत्या कर दी। इससे पहले पुलवामा के निकलोरा क्षेत्र में आतंकियों ने नदीम मंजूर नामक एक छात्र की गला रेतकर हत्या कर दी थी। इन दोनों ही मामलों में आतंकियों को शक था कि ये मुखबिरी का काम करते हैं और इसलिए उन्हें बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया। राज्य में दो दिनों के अंदर हुई यह दूसरी वारदात को अंजाम देकर जहां आतंकियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई तो वहीं सुरक्षाबलों के लिए चुनौती भी खड़ी कर दी है। दरअसल जहां आतंकी इस तरह की वारदात करने में सफल हो जाते हैं तो वहीं दूसरी तरफ इससे स्थानीय लोगों में दोगुना भय व्याप्त हो जाता है। सब कुछ देखते और सुनते हुए भी वो कुछ बता नहीं पाते हैं और ऐसे में आतंकवादी अपनी मनमर्जी से इन लोगों से वो सब काम कराते चले जाते हैं जिन्हें हम गैरकानूनी कह सकते हैं। मरता क्या नहीं करता वाली स्थिति में आए कश्मीरी नागरिक इस तरह से सेना और आतंकवादी रुपी चक्की के दो पाटों के बीच पिसते नजर आते हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि जिस तरह से जम्मू-कश्मीर के शोपियां जिले में आतंकवादियों ने कायरना हरकत को अंजाम देते हुए एक किशोर की गला रेतकर हत्या की उससे सुरक्षा के इंतजामों पर भी सवालिया निशान लग गए हैं। इसका अर्थ यही है कि घाटी में आतंकियों पर लगाम कसने के जो दावे लगातार सरकारें करती रही हैं वो सिरे से गलत साबित हो रहे हैं। सूत्रों की मानें तो शोपियां जिले में शनिवार को अज्ञात बंदूकधारियों ने तीन नागरिकों को अगवा किया था। इनमें से एक की हत्या करने के बाद दो लोगों को छोड़ दिया गया। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इसे अमानवीयकृत्य करार दिया और घटना की निंदा करते हुए दोषियों को सख्त सजा दिए जाने की मांग भी की, लेकिन इससे क्या क्योंकि कहीं न कहीं इस प्रकार की होने वाली घटनाओं पर राजनीति करने का आरोप भी तो ऐसे ही नेताओं पर लगते रहे हैं। गौर करें इससे पहले जब महबूबा मुफ्ती भाजपा के सहयोग से जम्मू-कश्मीर की सत्ता संभाल रहीं थीं तो उन्होंने भी केंद्र से अलगाववादियों से बातचीत करने और सेना के दखल को कम करने की सिफारिश की थी, लेकिन उनकी बात तब नहीं मानी गई और विरोधियों ने यहां तक कह दिया था कि वो तो अलगाववादियों की समर्थक हैं और इसलिए कहीं न कहीं आतंकियों को उनसे ही बल मिलता है। इसके बाद विपक्ष ने महबूबा सरकार पर लगातार हमले किए थे, जिसके परिणामस्वरुप मुख्यमंत्री पद से उन्होंने इस्तीफा देकर अपने आपको अलग कर लिया था। बहरहाल केंद्र का मानना रहा है कि यदि सेना को ज्यादा से ज्यादा छूट दी जाए तो आतंकवाद की समस्या हल हो जाएगी। अब चूंकि मोदी सरकार का कार्यकाल भी पूरा होने को आया है और आतंकी गतिविधियां जम्मू-कश्मीर से लेकर पंजाब तक में लगातार देखी जा रही हैं तो सवाल पुन: उठ रहा है कि कहीं न कहीं केंद्र से कोई चूक अवश्य ही हुई है जिस कारण समस्या घटने की बजाय बढ़ती ही चली जा रही है। इसलिए कहा जा रहा है कि एक बार फिर अलगाववादियों से जहां बातचीत के रास्ते खोले जाने चाहिए वहीं यह भी तय किया जाना चाहिए कि घाटी के लोगों में पुलिस व सुरक्षाबलों के साथ ही साथ सरकार पर विश्वास बढ़ाने के प्रयास किए जाएं।

 इसके बगैर आतंकवादी यूं ही मुखबिरी के शक में लोगों को हलाक करते रहेंगे, सूरक्षाबलों से मुठभेड़ होती रहेंगी और हमारी सेना के बेशकीमती जवान शहीद होते रहेंगे। इसकी दहशत में स्थानीय नागरिक आवश्यक सूचनाएं देने से गुरेज करते रहेंगे, जिसका खामियाजा भी कहीं न कहीं घाटी से देश तक को उठाना पड़ेगा। इसलिए एक बार फिर विचार करने की आवश्यकता आन पड़ी है कि आखिर आतंकवाद के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में हमसे कहां चूक हो रही है, जिस कारण आतंकियों के हौसले इस कदर बुलंद होते चले जा रहे हैं कि एक बार फिर वो सिर उठाने में सफल हो रहे हैं और स्थानीय लोगों के लिए मुसीबत बने हुए हैं। 
 

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