दीपावली में आध्यात्मिकता और सांसारिकता तक का समावेश

Publish Date : 06 / 11 / 2018

 दीपावली सभी के लिए खुशियों का पैगाम लेकर आती है। यह वाक्य क्या सचमुच में फलीभूत होता हुआ दिखाई दे रहा है क्योंकि देखने में तो यह आता है कि इस अत्याधुनिक युग में भी नौनिहाल कहे जाने वाले मासूम बच्चे आज भी या तो कचरा बीनते नजर आ जाते हैं या फिर भीख मांगते और कचरे में निवाला तलाशते दिख जाते हैं। ये हृदय विदारक घटनाएं शहरों की चमचमाती सड़कों के किनारे अक्सर देखने को मिल जाती हैं। इन्हें देख आंखें नम हो जाती हैं और दिल में एक टीस उठती है कि आखिर हम किस समाज में रह रहे हैं जहां मानवता मर रही है और पशुता को स्थापित किया जा रहा है। 'रसो वैसह' वाला हृदय तो मानों बीते जमाने की बात हो गई है, इसलिए किसी के कष्ट को देखकर अब हृदय दृवित भी नहीं होता है। इसका मुख्य कारण गरीबी और अमीरी के बीच बनी चौड़ी खाई है, जिसे पाटने की प्रतिज्ञा तो हर जिम्मेदार इंसान लेता है, लेकिन कर कुछ नहीं पाता है। इसलिए जहां कुछ लोगों के लिए दीपावली खुशियों की सौगात लेकर आती है तो कुछ लोग इन खुशियों के लिए तरसते रह जाते हैं। ऐसा नहीं है कि सभी लोग पत्थर दिल हो गए हैं बल्कि करोड़ों में कुछ लोग तो ऐसे हैं जो इन गरीबों की फिक्र करते हैं और उन्हें खुशियों के पल देने की कोशिशें भी करते हैं। संभवत: यही वजह है कि ईश्वर ने अभी तक दुनिया में प्रलय लाने का मन नहीं बनाया है, वर्ना हालात तो ऐसे हो गए हैं कि जिंदा रहते हुए लोग नरक का अनुभव करते हैं और यमराज बने चंद लोग मनमर्जी चलाते भी नजर आ जाते हैं। बहरहाल यहां हम उस पर्व और त्योहार की बात कर रहे हैं जिसे प्रकाश का पर्व कहा जाता है। इस प्रकाश पर्व दीपावली में आध्यात्मिकता से लेकर सांसारिकता तक का समावेश होता है। इसलिए इस त्योहार को मनाने से ज्यादा समझने और उसके अनुसार आचरण करने की आवश्यकता होती है। दरअसल हमने सदियों से इस त्योहार को पारंपरिक ढंग से मनाया तो है, लेकिन इसमें समाहित मानवता और भाईचारे के साथ ही साथ अन्याय के खिलाफ खड़े होने के संदेश को आत्मसात नहीं किया। यही वजह रही है कि जिस प्रकार प्रतिवर्ष रावण के पुतले को जलाया जाता है, लेकिन असल में देखने में आता है कि उसका कद उतना ही बढ़ता चला जा रहा है। इस कारण समाज में अपराधियों का बोलवाला हो रहा है, जबकि ईमानदार और बेकसूर लोगों को सजाएं मिल रही हैं। ठीक उसी प्रकार  अंधकार से विजय प्राप्त करने के लिए हम सांकेतिक तौर पर तो दीपों को जलाने का काम सदियों से करते चले आ रहे हैं, लेकिन हमारे अंत: में विराजे अंधकार को हटाने की दिशा में हमने किंचित भी प्रयास नहीं किया है। इस प्रकार दिखावा चहुंओर हावी हो रहा है और दीपावली के आध्यात्मिक संदेश को समझने और अपने जीवन में उतारने की तरफ हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा रहे हैं। यही वजह है कि समय का चक्र चलता रहता है और दिन-रात हमारी जिंदगी में आते-जाते रहते हैं, लेकिन अंधकार में पड़ी जिंदगियों को रोशन करने का हम किंचित भी काम करते नहीं देखे जाते। इसके चलते भारत में ही गरीबों और मजलूमों की संख्या इस कदर बढ़ती चली जा रही है कि आंकड़े देखकर शर्म से सिर झुक जाता है। अगर ऐसा नहीं है तो खुद अपने आप से आत्ममंथन करें और देखें कि इतने सालों में कितने भूखे-प्यासे, मजबूर लोगों की जिंदगी को हमने सदा के लिए रोशन किया? आखिर कब हमने परवाह की कि हम जो अपने लिए चाहते हैं वो हमारे पड़ोसी या सगे-संबंधियों व नाते-रिश्तेदारों को भी मिल सके। हम खुश होते रहे, जबकि आस-पड़ोस में रहने वाले गरीब के बच्चे भूखे-प्यासे कितनी रातें गुजारीं इसका भी हमें अनुमान नहीं होता है। बहरहाल हम भारतीयों की अपनी ही समृद्ध परंपराएं हैं, जिनका पालन हम धर्म और आस्था से जोड़कर करते चले आ रहे हैं। इन्हीं परंपराओं का निर्वाह करते हुए इस दीपावली विचार करें कि अंधकार से लड़ते छोटे-छोटे दीपों की श्रंखलाएं आखिर हमें क्या संदेश दे रही हैं। दरअसल ये कमजोर दिखने वाले दीपक हमें संदेश देते हैं कि अंधकार कितना ही व्यापक और भयावह क्यों न हो, यदि कमजोर दिखने वाले छोटे-छोटे असंख्य दीपक रुपी मानव इसके खिलाफ खड़े हो जाएं तो पूरी दुनिया को प्रकाशवान कर सकते हैं। 
यदि हम भारतीय जाति, धर्म, वर्ग, संप्रदाय और भाषाई व क्षेत्रीय भेद को भुलाकर एकजुट हो अंधकार रुपी भय, भूख और भ्रष्टाचार रुपी दुश्मनों के समक्ष खड़े हो जाएं तो यकीन मानिए उन्हें उल्टे पैर भागना पड़ जाएगा। पर अफसोस कि हम दीपावली के इस संदेश को समझने की कोशिश ही नहीं करते और हिंदू-मुस्लिम, सिख्ख-ईसाई से लेकर गरीब-अमीर और छुआ-छूत से लेकर उत्तर-दक्षिण के फेर में पड़ अपनी ही ताकत को कमजोर करने में लगे रहते हैं। आईये हम सब मिलकर इस दीपावली ऐसे ही एक दीप को प्रज्जवलित करें जिससे भय, भूख और भ्रष्टाचार का अंत हो सके। 
 

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