मां पार्वती ने किया था इस वटवृक्ष का रोपण, तर्पण से मिलती है समृद्धि

Publish Date : 28 / 09 / 2018

उज्जैन। सनातन संस्कृति में मानव जीवन को चार पुरुषार्थ के साथ सोलह संस्कारों में विभाजित किया है। जीवन की इहलोक से परलोक के महाप्रयाण की यात्रा में सोलह संस्कार पड़ावों की तरह है। प्राणोत्सर्ग के बाद जब आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है तब अपनों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने, श्रद्धांजलि देने और आदरभाव प्रकट करने का माध्यम होते हैं पिण्डदान और श्राद्ध, जो इंसानी जीवन के अंतिम संस्कार को बाद के अर्पण होते हैं। श्राद्ध घर, तीर्थ कहीं पर भी किया जा सकता है, लेकिन धरती पर कुछ जगह ऐसी भी हैं जहां किए गए पिण्डदान, तर्पण और श्राद्ध का अन्नतगुना फल प्राप्त होता है।ऐसा ही एक पुण्य स्थल मध्यप्रदेश में भगवान भूतभावन महाकाल की नगरी उज्जैन में सिद्धवट है। स्कन्दपुराण के अनुसार, क्षिप्रातट पर 28 तीर्थस्थल हैं, जिसमें 27वां तीर्थ सिद्धवट है। सिद्धवट को प्रेतशीला भी कहा गया है। सनातन संस्कृति में पांच वटवृक्षों को अक्षय माना गया है जिनमें वंशीवट-वृंदावन, पंचवट-नासिक, बोधीवट-गया, अक्षयवट-इलाहाबाद और सिद्धवट- उज्जैन हैं।

स्कन्दपुराण के अनुसार, माता पार्वती ने स्वयं अपने हाथों से इस वृक्ष का रोपण किया था। माता पार्वती ने अपने ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय को इसी वृक्ष के नीचे भोजन करवाया था। इसके पश्चात देवताओं ने भगवान कार्तिकेय का सेनापति पद पर अभिषेक भी इसी वटवृक्ष के नीचे किया था। भगवान कार्तिकेय ने देव-दानव युद्ध में दानवराज ताड़कासुर का वध किया था। युद्ध में कार्तिकेय ने जो शक्तिभेद चलाया था, वह क्षिप्राजी में लीन हुआ था। इसलिए इसको शक्तिभेद तीर्थ भी कहा जाता है।

एक अन्य आख्यान के अनुसार, कार्तिकेय ने जो शक्ति ताड़कासुर पर चलाई थी वह पृथ्वी को भेदकर पाताल में चली गई थी। इसलिए इसको शक्तिभेद तीर्थ कहा जाता है।

ह भी कहा जाता है कि यहीं पर अवंतिका के महान सम्राट विक्रंमादित्य ने घोर तपस्या कर वेताल सिद्धी प्राप्त की थी। सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा ने श्रीलंका आदि दूर-दराज के देशों में इसी वटवृक्ष का पूजन कर धर्मप्रचार की यात्रा प्रारंभ की थी। जनश्रुति के अनुसार, माता सीता ने भी यहां तपस्या की थी। इस वटवृक्ष को मुगलकाल में कटवाकर सात लोहे के तवों से पूरी तरह बंद कर दिया था, लेकिन आस्था और श्रद्धा का पर्याय यह वृक्ष फिर से भरा-भरा हो गया।

शास्त्रों में पितरों के तीन देवता वसु, रुद्र और आदित्य बताए गए हैं। चार ब्रह्मवृक्ष माने गए हैं। जो बड़, पीपल, गूलर और पाकर है। पीपल और वट दोनों ही भारतीय धर्म और आस्था के केन्द्र हैं। जटाधारी वटवृक्ष को साक्षात पशुपति शंकर का रूप माना गया है। शिव की जटाओं की तरह ही वटवृक्ष को भी कल्याणकारी, मंगलकारी माना गया है। राम, लक्ष्मण, सीता के द्वारा वनवास के दौरान वटवृक्ष को प्रणाम करने का उल्लेख रामायण में मिलता है। इसलिए सौभाग्य की कामना के साथ आज भी स्त्रियां वटवॉक्ष का पूजन करती है। वटसावित्री वृत का पारायण महिलाएं करती है। वट को 'पंचक्षीरवृक्षाणी' भी कहा जाता है। क्योंकि इसकी टहनियों और पत्तों से श्वेत दूध निकलता है।

स्कन्दपुराण के 58वें अध्याय में कहा गया है कि श्राद्धकर्म करने से प्रयाग में एक हजार गुना, कुरुक्षेत्र में एक लाख गुना, गया में एक करोड़ गुना और महाकाल वन में गया से दस गुना फल प्राप्त होता है। जीवन के ऋणों में पितृऋण प्रमुख है। सांसरिक कामना की पूर्ति के लिए पितरों के स्मरण, पूजन और अर्चन करने का शास्त्रोक्त विधान है, जिसके अंतर्गत पितृदोष, कालसर्पदोष निवारण, पिण्डदान, श्राद्धकर्म, अन्न-वस्त्र आदि का दान प्रमुख है। पिण्डदान श्राद्धकर्म कहां पर सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं इस संबंध में मार्कण्डेय पुराण में कहा गया है कि पुष्कर आदि तीर्थ, पर्वत शिखर, नदी, समुद्रतट या अपने स्वच्छ घर मे पितृकार्य किए जा सकते हैं।

पुराणों मे कहा गया है कि गया तीर्थ में श्राद्ध, पिण्डदान करने से सौ पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है, जिससे आयु, आरोग्य, पापों का नाश और मोक्ष का प्राप्ति होती है, लेकिन सिद्धवट पर जब पितों के निमित्त पिण्डदान कर दिया जाता है तो गयातीर्थ जाने की जरूरत नहीं होती है। सिद्धवट में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की मूर्तियां विराजमान है। वटवृक्ष का पूजन तीनों देवताओं के रूप में किया जाता है।

 

सिद्धवट पर संपति यानी धनकार्य, संतति यानी संतानकार्य और सदगति यानी पितृकार्य धार्मिक परंपरा के अनुसार संपन्न कराए जाते हैं। संपतिकार्य के लिए वटवृक्ष में धागा बांधा जाता है। संतान प्राप्ति के लिए उल्टा स्वास्तिक बनाया जाता है। पितृकार्य कै लिए वटवृक्ष की जड़ों में कच्चा दूध अर्पित किया जाता है और साथ ही घड़ों में दूध भरकर वटवृक्ष का अभिषेक किया जाता है, जिससे ये तीनों कार्य सिद्ध होते हैं। इसलिए इस वृक्ष को सिद्धवट कहा जाता है। कालसर्पदोष की निवारण सिद्धवट पर विराजित शिवलिंग पर दूध अर्पित कर किया जाता है। सिर्फ नासिक और सिद्धवट घाट पर ही कालसर्पदोष शांति, नागबलि, और नारायणबलि कर्म करने का प्रावधान है।

 

धर्मग्रंथों में मान्यता है कि मृत व्यक्ति की आत्मा अनन्तकाल तक अंतरिक्ष में प्रेतयोनी में भटकती रहती है। किंतु जब उसके पुत्र और पौत्र मृत व्यक्ति का श्राद्ध और पिण्डदान आदि करते हैं तब भटकती आत्मा प्रेतयोनी के मुक्त होकर पितृयोनी यानी पितृलोक की ओर प्रस्थान करती है। तृप्त होने पर यह पितृ अपने परिजनों को दीर्घायु, आरोग्य, सुख-समृद्धि से परिपूर्ण उनके निरंतर उत्कर्ष की मंगलकामना करते हैं। अनेक देवी-देवताओं के वास और पितों के निमित्त तर्पण की श्रेष्ठतम स्थली होने की वजह से इस वटवृक्ष को कल्पवृक्ष भी कहा जाता है। प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष की चतुर्दशी और अमावस्तया तिथि को यहां पर कच्चा दूध चढ़ाने की परंपरा है।

 

शास्त्रो के अनुसार अमावस्या के पहले आने वाली चतुर्दशी को दूध चढ़ाने का ज्यादा महत्व है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो मनुष्य इस पिशाचतीर्थ में विशेषत: चतुर्दशी तिथि को स्नान करके भक्तिपूर्वक तिलदान देता है। वह कभी पिशाच योनी को प्राप्त नहीं करता है साथ ही उसका कुल भी पिशाच योनी से मुक्त हो जाता है।

सिद्धवट पुण्यक्षेत्र में अनेकानेक देवी-देवताओं का वास है। प्रांगण में दो धर्मस्तंभ है। प्राचीन समय में सिद्धवट पर स्थित पण्डे-पुजारी धर्मस्तंभ के हिस्से का भोजन-प्रसादी निकालते थे, जिससे इस सिद्धक्षेत्र में आने वाले साधु-संतों को खाना मिलता था। सिद्धवट का नजदीक खगार तीर्थ है। स्कंद पुराण के अनुसार शिवजी की जटा से गंगा जब छलकी थी तब उसका जल यहां गिरा था। गंगा, क्षिप्रा और फल्गू के संगम से यह त्रिवेणी भी है।प्रकृति सृजन में सुखानुभूति और सुकून है। इसके पूजन-अर्चन से प्रकृति के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा और सम्मान झलकता है। पत्र, पुष्प जहां दर्शनमात्र से हमको आनन्द और शांति प्रदान करते हैं, वहीं इनसे उत्पन्न सुगंध और आबोहवा तन-मन में ताजगी और तरंग भर देती है। इसके सानिध्य में जो भक्तिभाव के झरने हैं वो मन की कलुषता को धो देते हैं। रंगबिरंगे फूल और खूबसूरत घनी शीतल छाया के वृक्ष का सामीप्य में सृष्टी के अनेकानेक चराचर जीव-जन्तु पलते हैं। सिद्धवट और पुण्यसलीला क्षिप्रा के समीप कुछ क्षण भी बिताने से मानव जीवन को कई जन्मों का पुण्य प्राप्त हो जाता है। सिद्धवट पर किए गए शास्त्रोक्त विधान से मानव मन को मिलता है सच्चा सुख और परमशांति का संजीवनी मंत्र।

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