16 जुलाई को गुरु पूर्णिमा के दिन है चंद्र ग्रहण, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि

Publish Date : 15 / 07 / 2019

नई दिल्‍ली: गुरु और गुरु पूर्णिमा का हिन्‍दू धर्म में विशेष महत्‍व है. हिन्‍दुओं में गुरु का सर्वश्रेष्‍ठ स्‍थान है. यहां तक कि गुरु का दर्जा भगवान से भी ऊपर है क्‍योंकि वो गुरु ही है जो हमें अज्ञानता के अंधकार से उबारकर सही मार्ग की ओर ले जाता है. यही वजह है कि देश भर में गुरु पूर्णिमा का उत्‍सव धूमधाम से मनाया जाता है. मान्‍यता है कि इसी दिन आदिगुरु, महाभारत के रचयिता और चार वेदों के व्‍याख्‍याता महर्षि  कृष्‍ण द्वैपायन व्‍यास यानी कि महर्षि वेद व्‍यास का जन्‍म हुआ था. वे संस्कृत के महान विद्वान थे. महाभारत (Mahabharat) जैसा महाकाव्य उन्‍हीं की देन है. इसी के 18वें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण गीता का उपदेश देते हैं. सभी 18 पुराणों का रचयिता भी महर्षि वेदव्यास को माना जाता है. वेदों को विभाजित करने का श्रेय भी इन्हीं को दिया जाता है. इसी कारण इनका नाम वेदव्यास पड़ा था. वेदव्यास जी को आदिगुरु भी कहा जाता है इसलिए गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है.  गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा-आराधना करने का विधान है. इस बार गुरु पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण भी है. 

गुरु पूर्णिमा कब है?
हिन्‍दू कैलेंडर के मुताबिक आषाढ़ शुक्‍ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं. ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार गुरु पूर्णिमा हर साल जुलाई महीने में आती है. इस बार गुरु पूर्णिमा 16 जुलाई को है. 

गुरु पूर्णिमा की तिथि और शुभ मुहूर्त
गुरु पूर्णिका की तिथि: 
16 जुलाई 2019
गुरु पूर्णिमा प्रारंभ: 15 जुलाई 2019 को रात 01 बजकर 48 मिनट से 
गुरु पूर्णिमा तिथि सामप्‍त: 16 जुलाई 2019 की रात 03 बजकर 07 मिनट तक

गुरु पूर्णिमा का महत्‍व
गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा का विधान है. दरअसल, गुरु की पूजा इसलिए भी जरूरी है क्‍योंकि उसकी कृपा से व्‍यक्ति कुछ भी हासिल कर सकता है. गुरु की महिमा अपरंपार है. गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्‍ति नहीं हो सकती. गुरु को तो भगवान से भी ऊपर दर्जा दिया गया है. इस दिन गुरु की पूजा की जाती है. पुराने समय में गुरुकुल में रहने वाले विद्यार्थी गुरु पूर्णिमा के दिन विशेष रूप से अपने गुरु की पूजा-अर्चना करते थे. गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु में आती है. इस मौसम को काफी अच्‍छा माना जाता है. इस दौरान न ज्‍यादा सर्दी होती है और न ही ज्‍यादा गर्मी. इस मौसम को अध्‍ययन के लिए उपयुक्‍त माना गया है. यही वजह है कि गुरु पूर्णिमा से लेकर अगले चार महीनों तक साधु-संत विचार-विमर्श करते हुए ज्ञान की बातें करते हैं. इस दिन केवल गुरु की ही नहीं, बल्‍कि घर में अपने से जो भी बड़ा है यानी कि माता-पिता, भाई-बहन, सास-ससुर को गुरुतुल्य समझ कर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है.

गुरु पूर्णिमा की पूजा विधि
हिन्‍दू धर्म में गुरु को भगवान से ऊपर दर्जा दिया गया है. गुरु के जरिए ही ईश्‍वर तक पहुंचा जा सकता है. ऐसे में गुरु की पूजा भी भगवान की तरह ही होनी चाहिए. गुरु पूर्णिमा के दिन आप इस तरह अपने गुरु की पूजा कर सकते हैं:
- गुरु पूर्णिमा के दिन सुबह-सवेरे उठकर स्‍नान करने के बाद स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें. 
- फिर घर के मंदिर में किसी चौकी पर सफेद कपड़ा बिछाकर उस पर 12-12 रेखाएं बनाकर व्यास-पीठ बनाएं. 
- इसके बाद इस मंत्र का उच्‍चारण करें- 'गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये'. 
- पूजा के बाद अपने गुरु या उनके फोटो की पूजा करें. 
- अगर गुरु सामने ही हैं तो सबसे पहले उनके चरण धोएं. उन्‍हें तिलक लगाएं और फूल अर्पण करें. 
- अब उन्‍हें भोजन कराएं. 
- इसके बाद दक्षिण दें और पैर छूकर विदा करें.
- इस दिन आप ऐसे किसी भी इंसान की पूजा कर सकते हैं जिसे आप अपना गुरु मानते हों. फिर चाहे वह ऑफिस के बॉस हों, सास-ससुर, भाई-बहन, माता-पिता या दोस्‍त ही क्‍यों न हों. 
- अगर आपके गुरु का निधन हो गया है तो आप उनकी फोटो की विधिवत् पूजा कर सकते हैं. 

गुरु पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण
इस बार गुरु पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण भी है. यह ग्रहण कुल 2 घंटे 59 मिनट का होगा. भारतीय समय के अनुसार चंद्र ग्रहण 16 जुलाई की रात 1 बजकर 31 मिनट पर शुरू होगा और 17 जुलाई की सुबह 4 बजकर 30 मिनट पर समाप्‍त हो जाएगा. इस दिन चंद्रमा पूरे देश में शाम 6 बजे से 7 बजकर 45 मिनट तक उदित हो जाएगा इसलिए देश भर में इसे देखा जा सकेगा. 

ग्रहण का समय और सूतक काल 
शास्‍त्रों के नियम के अनुसार चंद्र ग्रहण का सूतक ग्रहण से नौ घंटे पहले ही शुरू हो जाता है. तो इस हिसाब से सूतक 16 जुलाई को शाम 4 बजकर 31 मिनट से ही शुरू हो जाएगा. ऐसे में सूतक काल शुरू होने से पहले गुरु पूर्णिमा की पूजा विधिवत् कर लें. सूतक काल के दौरान पूजा नहीं की जाती है. सूतक काल लगते ही मंदिरों के कपाट भी बंद हो जाएंगे. 
ग्रहण काल आरंभ: 16 जुलाई की रात 1 बजकर 31 मिनट 
ग्रहण काल का मध्‍य: 17 जुलाई की सुबह 3 बजकर 1 मिनट 
ग्रहण का मोक्ष यानी कि समापन: 17 जुलाई की सुबह 4 बजकर 30 मिनट  
 
महर्षि वेद व्‍यास की जन्‍म कथा
पौराणिक कथा के अनुसार विश्व के पहले पुराण विष्णु पुराण की रचना करने वाले महर्षि पराशर एक बार यमुना नदी के किनारे भ्रमण के लिए निकले. भ्रमण करते हुए उनकी नजर एक सुंदर स्त्री सत्यवती पर पड़ी. मछुआरे की पुत्री सत्यवती,दिखने में तो बेहद आकर्षक थी लेकिन उसकी देह से हमेशा मछली की गंध आती थी, जिसकी वजह से सत्यवती को मत्स्यगंधा भी कहा जाता था.

महर्षि पराशर, सत्यवती के प्रति आकर्षित हुए बिना रह नहीं पाए. उन्होंने सत्यवती से उन्होंने नदी पार करवाने की गुजारिश की. सत्यवती ने उन्हें अपनी नाव में बैठने के लिए आमंत्रित किया. नाव में बैठने के बाद पराशर ऋषि ने सत्यवती के सामने प्रणय निवेदन किया, जिसे सत्यवती ने सशर्त स्वीकार किया. पराशर ऋषि, सत्यवती के साथ संभोग करना चाहते थे, जिसकी स्वीकृति देने से पहले सत्यवती ने उनके सामने अपनी तीन शर्तें रखीं.

सत्यवती की पहली शर्त थी कि उन्हें संभोग करते हुए कोई भी जीव ना देख पाए. पराशर ने इस शर्त को स्वीकार करते हुए अपनी दैवीय शक्ति से एक द्वीप का निर्माण किया जहां घना कोहरा था. इस कोहरे के भीतर कोई भी उन्हें नहीं देख सकता था. सत्यवती की दूसरी शर्त थी कि उसके शरीर से आने वाली मछली की महक के स्थान पर फूलों की सुगंध आए. पराशर ने ‘तथास्तु' कहकर यह शर्त भी स्वीकार कर ली और सत्यवती के शरीर में से आने वाली मछली की गंध समाप्त हो गई. इसके विपरीत उसकी देह फूलों की तरह महकने लगी.

तीसरी शर्त के रूप में सत्यवती ने कहा कि सहवास के बाद जब वह गर्भ धारण करेगी तो उसका पुत्र कोई सामान्य व्यक्ति नहीं बल्कि महाज्ञानी होना चाहिए, ना कि एक मछुआरा. सत्यवती की यह शर्त भी पराशर ऋषि द्वारा मान ली गई. साथ ही पराशर ऋषि ने यह भी वरदान दिया कि सहवास के बाद भी उनका कौमार्य कायम रहेगा.

सत्यवती और ऋषि पराशर ने कोहरे से भरे द्वीप पर संभोग किया. समय आने पर सत्यवती ने एक पुत्र को जन्म दिया, जो जन्म के साथ ही महाज्ञानी था. सत्यवती और पराशर की संतान का रंग काला था, जिसकी वजह से उसका नाम कृष्ण रखा गया. यही कृष्ण आगे चलकर वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए.

कृष्ण जब बड़े हुए तब उन्होंने अपनी मां से कहा कि जब भी वह किसी विपत्ति के समय उन्हें याद करेंगी, वह उपस्थित हो जाएंगे. इतना कहकर वे तप करने के लिए द्वैपायन द्वीप की ओर प्रस्थान कर गए.

बाद में सत्‍यवती का विवाह हस्तिनापुर के राजा शांतनु से हो गया. सत्यवती और शांतनु के दो पुत्र चित्रांगद और विचित्रवीर्य हुए. बाद में गंधर्वों से युद्ध करते हुए चित्रांगद की मृत्‍यु हो गई.  कुछ समय बाद विचित्र वीर्य की शादी अम्बिका और
अम्‍बालिका से हो गई. दोनों ही रानियों से विचित्रवीर्य की कोई सन्तान नहीं हुई और वे क्षय रोग से पीड़ित हो कर मृत्यु को प्राप्त हो गए.

दोनों पुत्रों की मृत्यु के बाद सत्यवती को यह भय सताने लगा कि ऐसे तो वंश समाप्त हो जाएगा. सत्यवती ने पहले भीष्म से आग्रह किया कि वह विचित्रवीर्य की रानियों के साथ नियोग कर संतान उत्पत्ति का मार्ग खोलें, लेकिन भीष्म की प्रतिज्ञा ने
उन्हें अपनी माता की आज्ञा का पालन नहीं करने दिया.

सत्यवती अत्यंत निराश और दुखी हो गई. ऐसे में उन्हें अपने पुत्र वेद व्यास की याद आई. वेद व्यास ने उनसे कहा था कि वह किसी भी विपत्ति में उनका साथ देंगे. अपनी मां के कहने पर वेद व्यास ने विचित्रवीर्य की रानियों के साथ नियोग किया,
जिसके बाद पांडु और धृतराष्ट्र का जन्म हुआ.

वेद व्यास ने विचित्रवीर्य की रानियों, अंबिका और अंबालिका के अलावा एक दासी के साथ भी नियोग की प्रथा का पालन किया, जिसके बाद विदुर का जन्म हुआ. तीनों पुत्रों में से विदुर वेद-वेदान्त में पारंगत और नीतिवान पुत्र थे.

द्वैपायन द्वीप पर जाकर तपस्या करने और काले रंग की वजह से उन्हें कृष्ण द्वैपायन नाम दिया गया, जो आगे चल कर वेदों का भाष्य करने के कारण वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए.

वेदों का विस्तार करने के कारण उन्‍हें वेदव्यास तथा बदरीवन में निवास करने के कारण बादरायण के नाम से भी जाना जाता है. वेद व्यास ने चारो वेदों के विस्तार के साथ-साथ 18 महापुराणों तथा ब्रह्मसूत्र का भी प्रणयन किया. हिन्दू पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने ही व्यास के रूप में अवतार लेकर वेदों का विस्तार किया था.

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